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Showing posts from June, 2015

अनकही

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आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई  महक उठी यादो की कलियाँ, धड़कनें घबराईं  चाँद रुक गया ,रात जग गयी ,चांदनी मुस्काई  वो तेरा खामोश रहकर मुझसे सब कुछ देना आँखों ही आँखों में सबसे ,छुप के गपशप कर लेना  यादों के आँगन से फिर से  धूप सुनहरी छाई  आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई  चलते चलते रास्तों पर हम मिले कुछ इस कदर  अनजानी राहों में चल के ,कोई पाये अपना घर  तेरी खुशबू  सांस बनकर ,धड़कनो में समाई आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई  ज़िन्दगी का ये सफर ,है बड़ा मुश्किल सफर  हर ख़ुशी में हर ग़म में ,तुझको ढूंढें ये नज़र  आये मुझको याद तुम और आँख ये भर  आई  आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई   नयन  जून,२१ ,२०१५  Image courtesy : Google 

अनकही

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ये कैसी जिद दे गए हो तुम की मैं मानती ही नहीं मैं ही हूँ या कोई और, जैसे खुद को जानती ही नहीं लोग पूछते हैं मुझसे ,मैं खुश हूँ की नहीं मैं सोचती हूँ , मैं हूँ तो सही  लोग ढूंढते हैं मुझमें , तुम हो की नहीं मैं खुश हूँ मुझमे तुम हो तो सही  तुम्हें खोना खुद को खोने जैसा है और तुम्हे पाना सपने जैसा है तुम्हे सोचना तुम्हारी होने जैसा है और तुम्हारी होना तुम्हे पाने जैसा है ऐसा नहीं की मेरे सपने बदल गए मेरा सच बदल गया या अपने बदल गए ऐसा नहीं की मन बदल गया छोटी सी बात है बस जीवन बदल गया ऐसा कम हीं बार होता है मन को कोई स्वीकार होता है कुछ लोग नियति कहते हैं बस ऐसे ही प्यार होता है दोनों हाथ प्रार्थना में जुड़ जाते हैं पाँव मंदिर की और मुड़ जाते हैं जिसे देखा नहीं,वो हर जगह होता है समझ से परे ,वह वो वजह होता है अगर मन को ये अधिकार होता और  नियति को स्वीकार होता तुम ही जिद होते और तुम्ही जिंदगी भी तुम ही दुआ होते और तुम्ही बंदगी भी तुमसे ही खुशियां होती ,तुमसे ही चाहत भी तुमसे ही आंसू होते, तुम से ही शिकायत भी

नीरव : तुम्हे देने को बहुत कुछ रखा है

तुम्हे देने को बहुत कुछ रखा है  वो तुम्हारे कुछ खत ,कुछ सूखे फूल और वो एक रात ना मैं बदली ना तुम बदले ,बदले तो बस कुछ वायदे हैं  मर्यादा और शिष्टता तो संसार के कुछ कायदे  हैं  प्रेम तो अब भी वहीं है ,वैसे ही आतुर व चंचल  है नहीं बस वो ह्रदय ,विश्वास से भरा व निश्छल   देह की व्याकुलता क्षणिक, नियति भी प्रकृति को विस्तार देना     ह्रदय नहीं नियमों में बंधा  ,नियति ,प्रकृति बस प्यार देना  प्रेम में बंध कर कभी भी, कोई नहीं फिर मुक्त होता  बस बदल जाते हैं बंधन, कोई कवि  कोई अव्यक्त होता   प्रेम में बस प्रेम ही होता है जीर्ण या रहता नवीन  प्रेम का तो  लक्ष्य होता  प्रेम में होना विलीन  तुमसे नहीं कोई शिकायत ,तुम बस एक बिसरी याद हो  हो नहीं तुम अब कहीं भी,हो भी तो मेरे बाद हो  खाली हाथ , निर्बल ह्रदय और अहम की गाँठ खोले  जीवन से थक, दूर प्रेम से ,रह जाओगे जब अकेले  आना तुम उसी जगह ,जहाँ प्रेम का  वचन दिया था  तुम्हे देने को बहुत कुछ रखा है तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी  विवशता और वो एक रात  वो तुम्हारी मुक्ति ,तुम्हारा जीव

अश्रुओं की भी अपनी कथा

वेदना के भार से  जब ह्रदय होता विकल  सत्य को स्वीकार करने , के प्रयत्न होते विफल  तब, नयनों  तक आकर  कुछ देर पलकों पर  ठहर  वापस चले जाते पुनः  असहाय से अपने नगर दुःख होता है चरम पर, और धैर्य की होती परीक्षा  ईश्वर और इंसान की, होती नहीं जब एक इच्छा  मन अधीर हो चाहता , संताप से जब मुक्त होना  संशय विकल हो चाहता  ,  सत्य से संयुक्त होना  तब , नयनों  तक आकर  कुछ देर पलकों पर  ठहर  वापस चले जाते पुनः  असहाय से अपने नगर अश्रुओं की भी अपनी कथा,  ना  कह सकें अपनी व्यथा  ना मुक्त हों , ना बंध सकें, जीवन की कैसी ये प्रथा  जो व्यक्त हो जाएं कहीं, तो  जग कहे दुर्बल है मन  और जो अव्यक्त हों, निष्ठुर कहे अपना ही मन  शब्द जब निःशब्द  होकर, मौन का करते वरण वाणी जब अवरुद्ध होकर,  करती ह्रदय का अनुसरण  तब , नयनों  तक आकर  कुछ देर पलकों पर  ठहर  वापस चले जाते पुनः  असहाय से अपने नगर निधि भारती  १० जून ,२०१५ 

A girl's pen : ईश्वर से : भाग II

A girl's pen : ईश्वर से : भाग II : क्या तुम नहीं रोते कभी और अगर रोते हो तो क्या रो रहे हो तुम अभी ? क्या धरती का आर्तनाद  आकाश तक पहुंचा  कभी और अगर पहु...

ईश्वर से : भाग II

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क्या तुम नहीं रोते कभी और अगर रोते हो तो क्या रो रहे हो तुम अभी ? क्या धरती का आर्तनाद  आकाश तक पहुंचा  कभी और अगर पहुँचा  है तो क्या पहुँच  रहा है  अभी ? मैं नहीं मांगूगी कुछ क्षीण या समृद्ध करो  बस छीन कर मुझसे मेरा न देवत्व अपना सिद्ध करो  मैं नहीं कहती कभी की मैं तुम्हारी भक्त हूँ अभिशाप और विवशता यही मनुष्य हूँ , अशक्त हूँ कर्म और धर्म तो बस तुम्हारे रचे कुछ खेल  हैं  कर्त्तव्य और प्रारब्ध  का  होता कहाँ कोई मेल है  क्या  देख तुम सकते नहीं  और अगर दृष्टि है तो क्या देख पाते हो अभी ? संघर्ष की शक्ति नहीं दुःख की अभिव्यक्ति नहीं  भय छूटने और टूटने का अब सर्वत्र व्याप्त है  ज्ञान मोह के वश हुआ, साहस  नहीं पर्याप्त है  जो देव हो तो ये कहो  क्या दुखी  होते नहीं ? जो देव हो तो हो द्रवित  क्या रो रहे हो तुम अभी ? निधि भारती  जून ९ ,२०१५ 

प्रेम का ही है निमंत्रण प्रेम ही पथ रोकता

प्रेम का ही है निमंत्रण  प्रेम ही  पथ रोकता कैसे और किसको बताऊँ  मन ये क्या क्या सोचता शत्रु तो तुम हो नहीं क्यों लूटते मन का नगर जो स्वप्न हो फिर ये बताओ क्यों जगाते हर प्रहर  ना तुम्हे मैं टोक पाऊँ ना स्वयं को रोक पाऊँ मुश्किलें पथ पर प्रबल हैं पग चाहे लेकिन चलती जाऊं  प्रेम में अब डूब कर ये प्रेम से  मुँह मोड़ता प्रेम का ही है निमंत्रण  प्रेम ही  पथ रोकता कैसे और किसको बताऊँ  मन ये क्या क्या सोचता निधि  जून ८,२०१५ 

शब्द

ह्रदय की कैसी ये विवशता , न सत्य को स्वीकार करता  ना ही है प्रतिकार करता  रुक जाऊं या पथ बदल लूँ बस यही विचार करता  आनंद की उन्मुक्तता  में  और विषाद की एकरूपता  में  अपनी नियति को समझने  का प्रयत्न बेकार करता  रुक जाऊं या पथ बदल लूँ बस यही विचार करता  आसक्ति  का कर्त्तव्य भी   और मुक्ति का दायित्व भी  बस देह को जीवन नदी के  इस पार से उस पार करता  रुक जाऊं या पथ बदल लूँ बस यही विचार करता  संयोग की अतिरेकता में  और वियोग की नीरवता में  दे बलिदान निज का सदैव  प्रेम  को साकार करता  रुक जाऊं या पथ बदल लूँ बस यही विचार करता  ह्रदय की कैसी ये विवशता , न सत्य को स्वीकार करता  ना ही है प्रतिकार करता  निधि भारती  ७ जून ,२०१५ 

ईश्वर से

शब्द नहीं मिल रहे कि तुम्हें कुछ लिख सकूँ कंठ भी अवरुद्ध है कि तुम्हें कुछ कह सकूँ    जानती हूँ व्यर्थ है पूछना तुम कौन हो  हो जहाँ भी जिस जगह,क्यों न जाने मौन हो  धर्म और कर्म की परिभाषाएं तुमने गढ़ी, हमने बस नियति की सीढियाँ ही हैं चढ़ी  मैं तो सहज हूँ अभी भी, जैसे पिछली बार थी  बदलेगी तो नियति हीं ,जैसे बदली पिछली हार थी  जानती हूँ  फिर तुम्हारी कोई नई ये परीक्षा है  इस परीक्षा के परिणाम की हीं मुझे भी प्रतीक्षा है  जानते हो तुम मुझे, ये कहाँ मैं जानती हूँ सिर्फ ये कहना है तुम्हें कि तुमको ही बस मानती हूँ  अब यहाँ से आस्था,शक्ति और विश्वास दो  धरती कि विवशता को आशा का आकाश दो  जानती हूँ पढ़ लोगे तुम ,जो नहीं मैं लिख सकी  मान लोगे वो बात भी ,जो नहीं मैं कह सकी  निधि भारती  ३ जून, २०१५