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मेरी अभिव्यक्ति

नारी का प्रेम प्रिय,नहीं होता कभी  इतना सरल अभियक्ति नहीं करती कभी, विरह की वेदना विरल जब प्रेम में आतुर ह्रदय , भूलता है जटिलता देह की पाषाण कर देती है ह्रदय को कोई विवशता नेह की मेरी आँखों से जो कभी तुम काश खुद को देख पाते मेरे ह्रदय का हर रहस्य ,मेरे ह्रदय ,तब जान पाते मैं नहीं तुमसे अलग, ये बात भी तुम जान जाते न पूछते मुझसे कभी,बस जान कर हीं मान जाते ह्रदय अब समझता है तुम्हें, और तुम्हारे प्रश्न को तुम हो परखना चाहते ,मुझे और मेरे प्रयत्न को मेरा समर्पण हीं देगा तुम्हें, मेरे निश्चय व प्रेम का प्रमाण स्वीकारोक्ति के उस एक क्षण की करते प्रतीक्षा मेरे भी प्राण शील और संकोच छोड़ अब , मैं मुक्त होना चाहती रोक लो मुझको यहीं की अब तुमसे बंधना चाहती बनना भी तुमसे चाहती , तुमसे हीं टूटना चाहती तुमसे हीं हार कर सदा , तुमसे हीं सधना चाहती नारी का प्रेम प्रिय,नहीं होता कभी  इतना सरल अभियक्ति नहीं करती कभी, विरह की वेदना विरल नारी का प्रेम प्रिय ,ऐसा हीं होता है जटिल और जटिल हो कर हीं ये जीवन को करता है सरल मेरी अभिव...

Love and Relationship

Fear and hope are two things which are constant . Either we live in  constant hope of not being scared of anything or we are too scared to be hopeful. With time thoughts change, ideology changes, the way we judge people, our reaction  to different situations, our  priorities, everything changes but in the midst of all , two things remain unchanged. Our nature to fear and to hope. These days I am reading the philosophy of Sadguru Jaggi Vasudev and that has helped me a lot to understand things in a different way. To love, fear and hope are not required at all, neither do they play any role but in a relationship they are the key elements.  Relationship is managing your love which involves the role of the other person whom we love and that makes it complicated and difficult but love is free of all the nuisances and the responsibilities. If we are in love, we just need to be ourselves. It does not require anything else but in a relationship we have to be to...

अनकही

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आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई  महक उठी यादो की कलियाँ, धड़कनें घबराईं  चाँद रुक गया ,रात जग गयी ,चांदनी मुस्काई  वो तेरा खामोश रहकर मुझसे सब कुछ देना आँखों ही आँखों में सबसे ,छुप के गपशप कर लेना  यादों के आँगन से फिर से  धूप सुनहरी छाई  आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई  चलते चलते रास्तों पर हम मिले कुछ इस कदर  अनजानी राहों में चल के ,कोई पाये अपना घर  तेरी खुशबू  सांस बनकर ,धड़कनो में समाई आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई  ज़िन्दगी का ये सफर ,है बड़ा मुश्किल सफर  हर ख़ुशी में हर ग़म में ,तुझको ढूंढें ये नज़र  आये मुझको याद तुम और आँख ये भर  आई  आज तन्हाई में जब याद तुम्हारी आई   नयन  जून,२१ ,२०१५  Image courtesy : Google 

अनकही

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ये कैसी जिद दे गए हो तुम की मैं मानती ही नहीं मैं ही हूँ या कोई और, जैसे खुद को जानती ही नहीं लोग पूछते हैं मुझसे ,मैं खुश हूँ की नहीं मैं सोचती हूँ , मैं हूँ तो सही  लोग ढूंढते हैं मुझमें , तुम हो की नहीं मैं खुश हूँ मुझमे तुम हो तो सही  तुम्हें खोना खुद को खोने जैसा है और तुम्हे पाना सपने जैसा है तुम्हे सोचना तुम्हारी होने जैसा है और तुम्हारी होना तुम्हे पाने जैसा है ऐसा नहीं की मेरे सपने बदल गए मेरा सच बदल गया या अपने बदल गए ऐसा नहीं की मन बदल गया छोटी सी बात है बस जीवन बदल गया ऐसा कम हीं बार होता है मन को कोई स्वीकार होता है कुछ लोग नियति कहते हैं बस ऐसे ही प्यार होता है दोनों हाथ प्रार्थना में जुड़ जाते हैं पाँव मंदिर की और मुड़ जाते हैं जिसे देखा नहीं,वो हर जगह होता है समझ से परे ,वह वो वजह होता है अगर मन को ये अधिकार होता और  नियति को स्वीकार होता तुम ही जिद होते और तुम्ही जिंदगी भी तुम ही दुआ होते और तुम्ही बंदगी भी तुमसे ही खुशियां होती ,तुमसे ही चाहत भी तुमसे ही आंसू होते, तुम से ...

नीरव : तुम्हे देने को बहुत कुछ रखा है

तुम्हे देने को बहुत कुछ रखा है  वो तुम्हारे कुछ खत ,कुछ सूखे फूल और वो एक रात ना मैं बदली ना तुम बदले ,बदले तो बस कुछ वायदे हैं  मर्यादा और शिष्टता तो संसार के कुछ कायदे  हैं  प्रेम तो अब भी वहीं है ,वैसे ही आतुर व चंचल  है नहीं बस वो ह्रदय ,विश्वास से भरा व निश्छल   देह की व्याकुलता क्षणिक, नियति भी प्रकृति को विस्तार देना     ह्रदय नहीं नियमों में बंधा  ,नियति ,प्रकृति बस प्यार देना  प्रेम में बंध कर कभी भी, कोई नहीं फिर मुक्त होता  बस बदल जाते हैं बंधन, कोई कवि  कोई अव्यक्त होता   प्रेम में बस प्रेम ही होता है जीर्ण या रहता नवीन  प्रेम का तो  लक्ष्य होता  प्रेम में होना विलीन  तुमसे नहीं कोई शिकायत ,तुम बस एक बिसरी याद हो  हो नहीं तुम अब कहीं भी,हो भी तो मेरे बाद हो  खाली हाथ , निर्बल ह्रदय और अहम की गाँठ खोले  जीवन से थक, दूर प्रेम से ,रह जाओगे जब अकेले  आना तुम उसी जगह ,जहाँ प्रेम का  वचन दिया था  ...

अश्रुओं की भी अपनी कथा

वेदना के भार से  जब ह्रदय होता विकल  सत्य को स्वीकार करने , के प्रयत्न होते विफल  तब, नयनों  तक आकर  कुछ देर पलकों पर  ठहर  वापस चले जाते पुनः  असहाय से अपने नगर दुःख होता है चरम पर, और धैर्य की होती परीक्षा  ईश्वर और इंसान की, होती नहीं जब एक इच्छा  मन अधीर हो चाहता , संताप से जब मुक्त होना  संशय विकल हो चाहता  ,  सत्य से संयुक्त होना  तब , नयनों  तक आकर  कुछ देर पलकों पर  ठहर  वापस चले जाते पुनः  असहाय से अपने नगर अश्रुओं की भी अपनी कथा,  ना  कह सकें अपनी व्यथा  ना मुक्त हों , ना बंध सकें, जीवन की कैसी ये प्रथा  जो व्यक्त हो जाएं कहीं, तो  जग कहे दुर्बल है मन  और जो अव्यक्त हों, निष्ठुर कहे अपना ही मन  शब्द जब निःशब्द  होकर, मौन का करते वरण वाणी जब अवरुद्ध होकर,  करती ह्रदय का अनुसरण  तब , नयनों  तक आकर  कुछ देर पलकों पर  ठहर  ...

A girl's pen : ईश्वर से : भाग II

A girl's pen : ईश्वर से : भाग II : क्या तुम नहीं रोते कभी और अगर रोते हो तो क्या रो रहे हो तुम अभी ? क्या धरती का आर्तनाद  आकाश तक पहुंचा  कभी और अगर पहु...